इलाहाबाद हाई स्कूल सोसाइटी का सचिव होने के नाते मैं अपना यह दायित्व समझता हूँ इलाहाबाद हाई सोसाइटी तथा चर्च ऑफ नोर्थ इंडिया के संबंधो पैदा हुए विवादों से संबंधित तथ्यो एवं सूचनाओ पर प्रकाश डालूं तथा उन्हे जन सामान्य, विशेषकर इलाहाबाद की जनता के साथ बांटु। सर्वप्रथम, मैं यह स्पष्ट करना चाहता हूँ की जिस भूमि पर यह दोनो विद्यालय अर्थात ब्वायज़ हाई स्कूल तथा गर्ल्स हाइ स्कूल एवं कॉलेज स्थित हैं वह इलाहाबाद हाई स्कूल सोसाइटी के स्वामित्व में है। इन संपत्तियो का अधिकांश हिस्सा स्वतंत्रता पूर्व इलाहाबाद हाई स्कूल सोसाइटी ने तत्कालीन सरकार से क्रय किया था, तथा बी एच परिसर का एक छोटा सा भाग, ब्रिटिश शासन के समय, इलाहाबाद हाई स्कूल सोसाइटी को शैक्षिक उद्देश्यो की पूर्ति हेतु, विद्यालय चलाने हेतु, कभी ना समाप्त होने वाली लीज़ के रूप में दिया गया था, इस भूमि का कोई भी हिस्सा कभी भी किसी चर्च के स्वामित्व में नही रहा, चाहे वह ब्रिटिश काल का चर्च ऑफ इंडिया, पाकिस्तान, बर्मा और सीलोन हो अथवा वर्तमान में चर्च ऑफ नॉर्थ इंडिया हो। वास्तविकता यह है की वर्तमान समय में इन संस्थाओ की कोई भी भूमि चर्च ऑफ नॉर्थ इंडिया के स्वामित्व में नही है जैसा की कुछ लोगो द्वारा प्रचारित किया हा रहा है। सत्य तो यह है कि जिस भूमि पर बिशप हाउस एवं जी जी ई सी (गवर्नमेंट गर्ल्स इंटर कॉलेज) स्थित है, तथा प्रसिद्द गिरजाघर के आसपास की भूमि भी चर्च ऑफ नॉर्थ इंडिया के स्वामित्व में नही है बल्कि वह तत्कालीन एंगलिकन चर्च जो उस समय चर्च ऑफ इंडिया के नाम से जाना जाता था, के संपत्तिया हैं। ब्वायज़ हाई स्कूल तथा गर्ल्स हाइ स्कूल एवं कॉलेज की स्थापना (१८६१) के समय से कभी भी चर्च ने इन संस्थाओ तो चलाने हेतु अथवा आधारभूत ढाँचे के विकास हेतु, किसी प्रकार का कोई भी आर्थिक योगदान नही दिया न ही कोई अचल संपत्ति ही दी है।
वर्तमान समय मैं जिसमें विशेषकर १८७२ में चर्च ऑफ नॉर्थ इंडिया, जो प्रार्थना के उद्देश्य से कई छोटे बड़े चर्चो का समूह है, की स्थापना के बाद से व्यापक रूप से संपत्तियो का विक्रय किया जा रहा है जो की यथार्थ में एंगलिकन चर्च की संपत्तिया हैं। कोई भी वरिष्ठ नागरिक जो की अपने बचपन से एंगलिकन चर्च का सदस्य रहा है, इस तथ्य से भली भाँति परिचित होगा की एंगलिकन चर्च की काफ़ी शहरी भूमि को अवैध तरीक़ो से बेचा जा चुका है, एवं चर्चो की अपनी भूमि, जो की चर्च ऑफ नॉर्थ इंडिया और दूसरे वास्तविक क्रिस्चियन चर्चो के पास पहले से थी, उसकी १/५ वें हिस्से से भी कम रह गयी है। बटवारें के बाद तथा अंग्रेज़ो के जाने के पश्चात बहुत सी ईसाई संस्थाए अपनी इच्छा से एंगलिकन चर्च के साथ थी और अपनी चल एवं अचल संपत्तियो के संरक्षण और बचाने के लिए वो चर्च को, जो की एक धार्मिक संस्था है, अपने धार्मिक अस्तित्व को बचाने के लिए एक कवच के रूप में प्रयोग करती थी। ऐसे समय में सोसाइटी के संविधान में कुछ संशोधन हुए जिससे सोसाइटी द्वारा चलाने वाली संस्थाओ की सुरक्षा, गतिशीलता और अस्तित्व का विकास हमारे देश में होने वाले तीव्र परिवर्तनो के साथ साथ हो सके। व्यक्तिगत लोगों ने और संस्थाओ ने एंगलिकन चर्च, जो की बाद में चर्च ऑफ इंडिया हो गया, से जुड़े रहने में अपनी भावनात्मक एवं भौतिक सुरक्षा का अनुभव किया। तथा बदले में उन्हे एक सुरक्षा कवच प्राप्त हुआ क्योकि चर्च ऑफ इंडिया के बिशप एवं अन्य पदाधिकारी अपनी धर्मनिष्ठा एवं मानवता के प्रति सेवा के लिए आदर एवं विश्वास के अधिकारी थे। वर्तमान समय की बदली हुई परस्थितियो में न तो धार्मिक पवित्रता है और न ही नैतिकता, चर्च ऑफ नॉर्थ इंडिया से न ही व्यक्तिगत और आर्थिक सुरक्षा की भावना हईयोर ना ही छाते जैसा कोई सुरक्षा कवच है। उदाहरण के लिए लखनऊ डाइयोसीज़, चर्च ऑफ नॉर्थ इंडिया, जिसकी कार्यप्रणाली को कुछ बाहरी उपद्रवी तत्व नियंत्रित करते है, के चर्च ऑफ नॉर्थ इंडिया के एंगलिकन सदस्यो की कार्यप्रणाली को दबाव द्वारा अवरुद्ध करने का प्रयास किया जाता रहा है। अंत: इलाहाबाद हाई स्कूल सोसाइटी के सदस्यो की सामूहिक सहमति से २००४ में यह निर्णय लिया गया कि, संरक्षण एवं सुरक्षा की दृष्टि से एवं सोसाइटी के संस्थापको द्वारा प्रदत्त, इलाहाबाद की जनता की धरोहर स्वरूप, इसकी आधारभूत संस्थाओ, बी एच एस एवं जी एच एस को बचाने के लिए सोसाइटी के संविधान में संशोधन किया जाए। संशोधन की इस प्रक्रिया के द्वारा पुरानी बहुत सी अधिनायकवादी, अप्रासंगिक बातों को संशोधित किया गया है। संशोधन के कुछ मुख्य बिंदु निम्नलिखित है: १. बिशप ऑफ लखनऊ के पदेन अध्यक्षता के प्रावधान को समाप्त कर दिया गया है। पुराने संविधान के अनुसार बिशप ऑफ लखनऊ, जो की चर्च ऑफ इंडिया, पाकिस्तान, बर्मा और सीलोन (चर्च ऑफ नॉर्थ इंडिया नहीं) का होता था, की पदेन अध्यक्षता किया करता था तथा उसकी अधिरोहरण शक्तियो, जिसके द्वारा वह संचालन समिति द्वारा पारित वह निर्णय जो की चर्च ऑफ इंडिया, पाकिस्तान, बर्मा और सीलोन के धार्मिक अधिकारो के विरुद्ध होता था, उसके संज्ञान में आने के १४ दीनो के अंदर निरस्त कर सकता था, को भी समाप्त कर दिया गया। क्योकि वर्तमान समय में इस प्रावधान की कोई आवश्यकता नही रह गयी है। इस संशोधन से चर्च ऑफ नॉर्थ इंडिया के लोगो को काफ़ी परेशानी महसूस हुई, यह तथ्य जानकर की अब बिशप के पास अधिरोहरण की कोई शक्ति नही है जिसके द्वारा वह सोसाइटी की संचालन समिति द्वारा पारित किसी निर्णय को बदलने या निरस्त करने का अधिकार रखता था, अब उसके पास मात्र चर्च से संबंधित धार्मिक मामलो की शक्तियाँ ही है। संविधान का यह भाग अत्यंत पुराना एवं महत्वहीन हो गया था क्योंकि वर्तमान समय में भारत में कोई चर्च ऑफ इंडिया, पाकिस्तान, बर्मा और सीलोन कार्यरत नही हैं, अंत: इसे संशोधित करके समाप्त कर दिया गया। साथ ही लोकतांत्रिक मूल्यो की सुरक्षा एवं जनहित की दृष्टि से यह आवश्यक था। २. अगला संशोधन सर्वाधिक महत्वपूर्ण है, जिसे मैं बताने जा रहा हूँ: पुरानी नियमावली के अनुसार सोसाइटी की किसे बैठक का कोरम सदस्य संख्या का १/३ था। यदि किसी सामान्य बैठक में कोरम पूरा नही है और तभी बैठक संपन्न होती है तो वह सदस्यो की पूर्ति हेतु विसर्जित मानी जायगी; जबकि अन्य स्थिति में वह बैठक स्थगित मानी जाती थी और अगले दिन उसी समय एवं उसी स्थान पर पुन: आयोजित होगी। तथा उस पुन: आयोजित बैठक में पुन: कोरम पूरा नही है तो केवल उपस्थित सदस्य संख्या ही कोरम मानी जाएगी। इसका तात्पर्य यह हुआ की संचालन समिति / सोसाइटी के मात्र दो सदस्य भी किसी महत्वपूर्ण निर्णय को पारित करने में सक्षम होते थे, जो की सोसाइटी को मान्य होता था। यह नियम हमारी लोकतांत्रिक भावना के विपरीत था एवं इसमे त्वरित संशोधन की आवश्यकता थी। संशोधन में १/३ सदस्यो को ३/५ सदस्यो से परिवर्तित कर दिया गया एवं "अगले दिन" को "अगली निर्धारित तिथि" में परिवर्तित कर दिया गया। साथ ही इस संशोधन के द्वारा वाक्य "पुन: आयोजित बैठक में पुन: कोरम पूरा नही है तो केवल उपस्थित सदस्य संख्या ही कोरम मानी जाएगी" को "जब तक आवश्यक कोरम पूरा नही होता" में परिवर्तित कर दिया गया। इस संशोधन का मुख्य उद्देश्य भारतीय संविधान के लोकतांत्रिक मूल्यो एवं भावना को आत्मसात करना है। साथ ही इन संस्थाओ को ऐसे लोगो से सुरक्षित करना है जो अपनी शक्ति एवं अधिकार में उन्मुक्त होकर अपने कर्तव्य एवं फ़र्ज़ को भूल बैठे है। ३. अगला मुख्य संशोधन, जिसके द्वारा वैयक्तिक पदाधिकारियो की शक्तियों के संचालन समिति की सामूहिक ज़िम्मेदारी के रूप में स्थानांतरित किया गया है। इसका उद्देश्य सोसाइटी की चल एवं अचल संपत्तियो की सुरक्षा करना है। पूर्व मैं पदाधिकारियो को कुछ अधिकार प्राप्त थे जिनके द्वारा वह वोटिंग प्रक्रिया को प्रत्यक्षतः एवं परोक्षत: प्रभावित कर सकते थे। सदस्यता की विभिन्न श्रेणियाँ होने के कारण कुछ पदाधिकारी नये सदस्यो के सोसाइटी में शामिल होने के समय अपने प्रभाव का दुरुपयोग करते थे। इस कारण सदस्यता की विभिन्न श्रेणियों को समाप्त कर दिया गया तथा सभी सदस्यो को समान स्तर एवं वोटिंग अधिकार प्रदान कर दिए गये है तथा वैकल्पिक वोटिंग को भी समाप्त कर दिया गया है। संशोधन के पूर्व के संविधान में सोसाइटी की सभी चल एवं अचल संपत्तियो का संरक्षक सोसाइटी का सचिव कार्यालय होता था, इस नाते उसे इन परिसंपत्तियो के संचालन संबंधी सभी अधिकार जैसे खरीदना, बेचना, बंधक रखना तथा ऋण इत्यादि प्राप्त थे। सचिव के इन । में संशोधन करके यह ज़िम्मेदारी संयुक्त रूप से पूरी संचालन समिति को दे दी गयी है, साथ ही यह प्रतिबंध भी निरूपित कर दिए गये है, की संचालन समिति को भी सोसाइटी के अचल संपत्ति के पूर्ण अथवा किसी भाग को बंधक बनाने, बेचने अथवा लीज़ पर देने से प्रतिबंधित कर दिया है। कुछ तत्वो द्वारा अभियान चलाकर दुष्प्रचार किया जा रहा है एएचएसएस एवं इसके सदस्यगण अवैधानिक एवं ग़लत तरीक़ो के द्वारा अपने आपको चर्च से पृथक कर लिए है, इसके पीछे इन तत्वो का मुख्य उद्देश्य एएचएसएस की छवि आम जनता के बीच धूमिल करना है। सर्वप्रथम एएचएसएस चर्च से पृथक नही हुई है, हम आज भी इंग्लिक चर्च के सदस्य है, और यदि इस नये परिवेश में इंग्लिकन चर्च के प्रतिनिधित्व एवं अधिकारो पर कुठाराघात होता है तो इंग्लिकन चर्च के सदस्यगण किसी भी वैधानिक कार्यवाही करने का अधिकार रखते है। जन सामान्य की सूचना के लिए मैं यह बताना चाहूँगा की यह सभी संशोधन वैधानिक रूप से एएचएसएस के संविधान एवं नियमावली के अनुसार किए गये है। इन संशोधनो को सोसाइटी रेजिस्ट्रेशन एक्ट १८६० तत्संबंधित प्राधिकारी कार्यालय में पंजीकृत कराया जा चुका है। कोई नयी सोसाइटी नही गठित की गयी है तथा सोसाइटी के नाम में भी कोई परिवर्तन नही किया गया है तथा सदस्यो की यथास्थिति जो के संशोधन के पूर्व थी वही आजतक बरकरार है।
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